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    09.06.2026: भगवान बिरसा मुंडा बलिदान दिवस के अवसर पर राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा का संबोधन

    प्रकाशित तारीख : June 9, 2026

    भगवान बिरसा मुंडा बलिदान दिवस के अवसर पर राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा का संबोधन। महाराष्ट्र लोक भवन ९ जून २०२६

    श्री देवेंद्र फडणवीस जी, सम्मानित मुख्यमंत्री,

    श्री एकनाथ शिंदे जी, सम्मानित उपमुख्यमंत्री,

    श्रीमती सुनेत्रा पवार जी, सम्मानित उपमुख्यमंत्री,

    डॉ. अशोक उईके जी, मंत्री आदिवासी विकास,

    श्री नरहरी झिरवाल जी, मंत्री अन्न एवं औषधि प्रशासन तथा विशेष सहायता,

    श्री इंद्रनिल नाइक, राज्य मंत्री आदिवासी विकास,
    महाराष्ट्र के विभिन्न भागों से पधारे सभी आदिवासी कलाकार, मीडिया प्रतिनिधिगण एवं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स,

    प्रगति प्रतिष्ठान तथा अन्य संस्थाओं के पदाधिकारी एवं स्वयंसेवक गण, तथा मेरे प्रिय भाइयों और बहनों,

    आज आदिवासी समाज के महानायक, स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत, समाज सुधारक तथा जनजातीय स्वाभिमान के प्रतीक भगवान बिरसा मुंडा का एक सौ छब्बीस वां बलिदान दिवस !

    इस अवसर पर सर्व प्रथम मै भगवान बिरसा मुंडा को नमन करता हूं, वंदन करता हूं और अभिवादन करता हूं।

    इस पावन अवसर पर मैं भगवान बिरसा मुंडा के साथ देश की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और जनजातीय अधिकारों के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले सभी आदिवासी क्रांतिकारियों को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक जनजाति वीरों और महापुरुषों के अद्भुत योगदान से आलोकित है।

    उनमें भगवान बिरसा मुंडा का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है।
    वर्ष १८७५ में जन्मे और मात्र २५ वर्ष की आयु में बलिदान देने वाले बिरसा मुंडा ने अपने छोटेसे जीवनकाल में जो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जागरण किया, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

    जनजातीय समाज उन्हें स्नेह और श्रद्धा से “धरती आबा” अर्थात् ‘धरती के पिता’ के रूप में स्मरण करता है। मै स्वयं Scheduled Tribe से आता हूं। जिस प्रकार भारत रत्न डॉ बाबासाहेब आंबेडकर किसी एक समाज विशेष के नहीं, अपितु पुरे देश के है, विश्व के है, भगवान बिरसा मुंडा भी पुरे भारत वर्ष के धरती आबा है ऐसा मै मानता हूं।

    भगवान बिरसा मुंडा केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि वे समाज सुधारक थे; आध्यात्मिक नेता थे और जनजागरण के महान प्रेरक भी थे।

    उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं, जनजातीय जीवन-मूल्यों और धार्मिक आस्थाओं का गहन अध्ययन किया।

    समाज में व्याप्त अंधविश्वास, नशाखोरी, कुरीतियों और सामाजिक विभाजन के विरुद्ध उन्होंने व्यापक जनजागरण अभियान चलाया। उनका कार्य महान है।

    बहानॊ और भाईयों,
    मैं जनजातीय कल्याण मंत्री डॉ. अशोक उईके से अनेक बार मिल चुका हूँ। कुछ समय पहले मैंने उनसे कहा था कि वे जनजातीय समाज के लोगों को लोक भवन लेकर आएँ। विशेष रूप से मैंने उनसे अनुरोध किया था कि वे जनजातीय कलाकारों, जनजातीय मीडिया प्रतिनिधियों और जनजातीय इन्फ्लुएंसर्स को भी लोक भवन लाएँ। मुझे प्रसन्नता है कि आपने हमारे निमंत्रण का सम्मान किया और आज आप लोक भवन में उपस्थित हैं।
    भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जनजातीय बहनों और भाइयों के अधिकारों के दृढ़ समर्थक हैं। वे कहते हैं कि “जनजातीय गौरव हजारों वर्षों से भारत की चेतना का अभिन्न हिस्सा रहा है। जब भी देश के सम्मान, स्वाभिमान और स्वराज का प्रश्न उठा है, तब हमारे जनजातीय समाज ने अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व किया है।”

    माननीय प्रधानमंत्री का यह दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारे जनजातीय भाई-बहन शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ेंगे, तो विकसित भारत के लक्ष्य को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे इस बात के प्रति पूरी तरह सजग हैं कि भारत की प्रगति तभी सार्थक और समावेशी होगी, जब जनजातीय समाज विकास की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक सहभागी बनेगा और उसे समान अवसर प्राप्त होंगे। इसलिए केंद्र तथा प्रदेश सरकार जनजातीय समुदायों के सर्वांगीण विकास, आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण के लिए निरंतर कार्य कर रही है।

    जैसा कि आप जानते हैं, महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में मैं राज्य के २९ विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति हूँ। मेरी जिम्मेदारी है कि राज्य में उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत बढ़ाकर ५० प्रतिशत तक पहुँचाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को आगे बढ़ाया जाए।

    इसी उद्देश्य से मैंने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से आग्रह किया है कि वे विद्यालयों में जाएँ, विद्यार्थियों से संवाद करें और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करें। विशेष रूप से मैंने उनसे जनजातीय विद्यार्थियों और जनजातीय बालिकाओं तक पहुँचने को कहा है।
    हम देखते हैं कि अनेक जनजातीय विद्यार्थी, विशेषकर बेटियाँ, विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक कारणों से उच्च शिक्षा के बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। यह केवल उनकी व्यक्तिगत क्षति नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र की भी क्षति है।

    सरकार जनजातीय विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क छात्रावास, भोजन तथा अन्य अनेक सुविधाएँ उपलब्ध करा रही है ताकि आर्थिक कठिनाइयाँ उनकी शिक्षा में बाधा न बनें। हमें इन अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए।

    मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि अपने बच्चों को, विशेषकर बेटियों को, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भेजने के लिए प्रोत्साहित करें। शिक्षा ही वह सबसे बड़ी शक्ति है जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सशक्त बनाती है। जब हमारे जनजातीय युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे, तब वे अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे।

    एक समय ऐसा था जब इस देश के अनेक क्षेत्रों पर जनजातीय शासकों का शासन था।

    मध्य भारत का विशाल भूभाग ‘गोंडवाना’ के नाम से प्रसिद्ध था, जिस पर गोंड राजाओं ने लंबे समय तक सफलतापूर्वक शासन किया।
    गोंड शासकों ने न केवल अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि समृद्ध संस्कृति, सुशासन और जनकल्याण की परंपराओं को भी विकसित किया। भारतीय इतिहास में उनका योगदान जनजातीय समाज की गौरवशाली विरासत और स्वाभिमान का महत्वपूर्ण अध्याय है।

    हमें अपने खोए हुए गौरव और सम्मान को पुनः प्राप्त करना है। यह कार्य केवल अतीत की स्मृतियों से नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण से संभव होगा। और भविष्य का निर्माण शिक्षा, कौशल विकास तथा संपत्ति और समृद्धि के सृजन के माध्यम से ही किया जा सकता है।

    हमें अपने समाज को बीमारियों, कुपोषण और सबसे बढ़कर हर प्रकार की नशे की प्रवृत्ति से भी मुक्त करना होगा। चाहे वह शराब का नशा हो, तंबाकू का सेवन हो या किसी अन्य प्रकार की लत, यह न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि परिवार और समाज की प्रगति में भी बाधा बनती है।

    विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि और आय में वृद्धि नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ अपनी पहचान, संस्कृति और विरासत को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ना है। हमें जनजातीय समाज की समृद्ध नृत्य परंपराओं, लोकसंगीत, कला, खान-पान, पारंपरिक ज्ञान और कृषि जैव-विविधता को भी संरक्षित करना होगा। यही हमारी सांस्कृतिक शक्ति और हमारी विशिष्ट पहचान है।

    इसी उद्देश्य से मैंने माननीय जनजातीय विकास मंत्री से आग्रह किया है कि जनजातीय कला, नृत्य और संगीत के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जाए। मैंने जनजातीय संशोधन एवं प्रशिक्षण संस्थान (TRTI) से भी कहा है कि वह भारत की विभिन्न जनजातियों के इतिहास, परंपराओं, जीवनशैली, ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का गहन अध्ययन करे, ताकि इस अमूल्य धरोहर का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और संरक्षण किया जा सके।

    मुझे प्रसन्नता है कि इस वर्ष वरिष्ठ तारपा वादक एवं लोककलाकार भिकल्या धिंडा को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह जनजातीय लोककला और कलाकारों के सम्मान की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। ऐसे कलाकार केवल कला के संवाहक नहीं होते, बल्कि वे हमारी सांस्कृतिक स्मृति और परंपराओं के जीवंत संरक्षक भी होते हैं।

    मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि जनजातीय समाज की दृश्य और अदृश्य – दोनों प्रकार की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सहयोग करें। हमारी कलाएँ, गीत, वाद्य, लोककथाएँ, पारंपरिक ज्ञान, कृषि पद्धतियाँ और जीवन-मूल्य केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य संपदा हैं। यदि हम इन्हें सहेजकर रखेंगे, तभी विकास और संस्कृति के बीच संतुलन बनाए रखते हुए एक सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली भारत का निर्माण कर सकेंगे।

    भगवान बिरसा मुंडा ने “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना” अर्थात् “अपना शासन स्थापित करो और अंग्रेजी शासन समाप्त करो” का उद्घोष किया। यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि स्वाभिमान, स्वशासन और स्वतंत्रता की जनजातीय आकांक्षा का सशक्त प्रतीक था।

    वर्ष १८९९-१९०० के दौरान उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ‘उलगुलान’ अर्थात् महान जनविद्रोह का नेतृत्व किया।
    ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के कारण आदिवासी समाज अपनी भूमि और आजीविका से वंचित हो रहा था। ऐसे समय में बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज को संगठित कर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंका।

    उनके बढ़ते प्रभाव और जनसमर्थन से ब्रिटिश शासन चिंतित हो उठा। अंततः ३ फरवरी १९०० को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। रांची कारागार में अमानवीय परिस्थितियों के बीच ९ जून १९०० को इस महान क्रांतिकारी का निधन हो गया। यद्यपि उनका जीवन अल्पकालिक था, किंतु उनके विचार, संघर्ष और बलिदान ने भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।

    भगवान बिरसा मुंडा का जीवन हमें यह संदेश देता है कि समाज की प्रगति शिक्षा, आत्मविश्वास, संगठन, सांस्कृतिक गौरव और अधिकारों के प्रति जागरूकता से ही संभव है। उनके आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे।

    इस अवसर पर मैं सभी आदिवासी भाइयों और बहनों से आग्रह करता हूँ कि वे भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए शिक्षा, कौशल, नवाचार और आत्मनिर्भरता के मार्ग पर आगे बढ़ें तथा राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ।
    आज आप सभी का लोक भवन में स्वागत करता हूं। आपसे मिलकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।

    मैं महाराष्ट्र शासन, जनजातीय संशोधन एवं प्रशिक्षण संस्थान (TRTI), प्रगती प्रतिष्ठान तथा उन सभी संस्थाओं, अधिकारियों, कलाकारों, मीडिया प्रतिनिधियों, स्वयंसेवकों और सहयोगियों का विशेष रूप से अभिनंदन करता हूँ, जिन्होंने आज के इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अथक परिश्रम किया है।

    मैं आप सभी को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि लोक भवन के द्वार मेरे सभी जनजातीय भाई-बहनों के लिए सदैव खुले रहेंगे।

    यह भवन केवल राज्यपाल का निवास नहीं है, बल्कि जनता का भवन है। आप जब भी यहाँ आएँगे, आपको अपनापन, सम्मान और सहयोग का वातावरण मिलेगा।

    आप सभी के उज्ज्वल भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि और निरंतर प्रगति के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जय हिंद। जय महाराष्ट्र।।